Kick Day Special: जब भृगु (Bhrigu) ऋषि ने भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर पैर रखा — और सनातन को मिला सबसे बड़ा जीवन-पाठ
आज की युवा पीढ़ी के लिए Kick Day अक्सर गुस्से, अस्वीकार या रिश्तों में दूरी का प्रतीक बन चुका है। लेकिन सनातन परंपरा में “किक” का अर्थ किसी को ठुकराना या अपमानित करना नहीं, बल्कि अहंकार को झकझोरना, चेतना को जगाना और भीतर बैठे मैं को त्यागना है। इसका सबसे गहरा और कालजयी उदाहरण है भृगु ऋषि और भगवान विष्णु की कथा—एक ऐसा प्रसंग जो पहली नज़र में चौंकाता है, पर अंततः करुणा, संयम और विनम्रता का शाश्वत संदेश देता है।
तीनों देवों में श्रेष्ठ कौन?—यहीं से कथा आरंभ होती है
प्राचीन काल में ऋषियों के बीच यह प्रश्न उठा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनों में श्रेष्ठ कौन है? इस निर्णय के लिए भृगु ऋषि को चुना गया। वे निष्पक्ष थे और किसी देवता की शक्ति नहीं, बल्कि स्वभाव, व्यवहार और चेतना की परीक्षा लेना चाहते थे।
भृगु ऋषि पहले ब्रह्मा के पास पहुँचे। वहाँ उन्हें अपेक्षित आदर नहीं मिला। फिर वे शिव के पास गए, जहाँ शिव की उग्रता और तांडवमय रूप ने उन्हें विचलित किया। अंततः वे वैकुण्ठ पहुँचे, जहाँ भगवान विष्णु योगनिद्रा में शयन कर रहे थे।
जब भगवान के वक्षस्थल पर पड़ा पैर
यहीं वह क्षण आता है, जो सदियों से लोगों को चकित करता है। भृगु ऋषि ने बिना कोई भूमिका बाँधे, भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर अपना पैर रख दिया—आज की भाषा में इसे किक कहा जाएगा। यही वह स्थान है जहाँ देवी लक्ष्मी का वास माना जाता है। शिष्टाचार, मर्यादा और सामाजिक नियमों के अनुसार यह कृत्य असहनीय था। यदि कोई भी सामर्थ्यवान होता, तो क्रोध अवश्य करता।
पर सनातन यहीं भिन्न हो जाता है।
क्रोध नहीं, करुणा बना ईश्वर का उत्तर
भगवान विष्णु तुरंत उठे। न कोई डाँट, न कोई क्रोध। उन्होंने भृगु ऋषि के चरण पकड़ लिए और स्नेह से पूछा—
“महर्षि, आपके पैर को तो चोट नहीं लगी?”
इतना ही नहीं, उन्होंने ऋषि के चरणों की मालिश भी की।
यह दृश्य केवल एक घटना नहीं था; यह अहंकार के विसर्जन और करुणा की विजय का घोष था। उसी क्षण भृगु ऋषि का अहं टूट गया। वे समझ गए कि सच्ची महानता शक्ति दिखाने में नहीं, शक्ति को साध लेने में है। यही कारण था कि उन्होंने विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ घोषित किया।
लक्ष्मी जी का वैकुण्ठ से प्रस्थान—एक गहरा संकेत
कथा में यह भी आता है कि इस प्रसंग के बाद देवी लक्ष्मी वैकुण्ठ से प्रस्थान कर गईं। इसका अर्थ यह नहीं कि विष्णु दोषी थे। बल्कि यह संकेत है कि जहाँ अपमान और अहंकार प्रवेश करता है, वहाँ समृद्धि स्थायी नहीं रहती। यह समाज के लिए एक स्पष्ट संदेश है—धन, वैभव और सौभाग्य का संबंध व्यवहार, मर्यादा और विनम्रता से है, न कि केवल अधिकार से।
Kick Day का सनातन अर्थ क्या है?
इस कथा के आलोक में Kick Day का अर्थ पूरी तरह बदल जाता है।
यह किसी रिश्ते को तोड़ने का नहीं, बल्कि अहंकार को बाहर करने का दिन है।
यह गुस्से को दिखाने का नहीं, बल्कि संयम को अपनाने का अवसर है।
भृगु ऋषि की किक शरीर पर थी, पर उसका प्रभाव मन पर पड़ा।
विष्णु की करुणा शांत थी, पर उसका संदेश युगों तक गूँजता रहा।
आज के समय में इस कथा की प्रासंगिकता
आज जब छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते टूट जाते हैं, संवाद समाप्त हो जाता है और अहंकार आगे आ जाता है, तब यह कथा हमें याद दिलाती है कि जीत हमेशा ऊँची आवाज़ से नहीं होती।
कभी-कभी जीत मिलती है चुप रहकर, झुककर और समझकर।
सोशल मीडिया के युग में, जहाँ “अनफ्रेंड” और “ब्लॉक” एक क्लिक में हो जाता है, वहाँ विष्णु का यह आचरण हमें सिखाता है कि संबंधों को बचाने के लिए शक्ति नहीं, संवेदना चाहिए।
सनातन का सबसे बड़ा पाठ
सनातन धर्म किसी घटना को केवल बाहरी रूप में नहीं देखता, वह उसके भीतरी अर्थ को समझाता है।
यह कथा कहती है—
अहंकार सबसे बड़ा शत्रु है
करुणा सबसे बड़ा बल है
संयम सबसे बड़ी विजय है
जब हम अपने भीतर बैठे अहंकार को “किक” करते हैं, तभी सच्ची शांति जन्म लेती है।
निष्कर्ष: किक किसी और को नहीं, अपने अहं को
इस Kick Day पर सनातन हमें यह स्मरण कराता है कि धर्म रिश्ते तोड़ने में नहीं, रिश्ते निभाने की कला में है।
सबसे बड़ी क्रांति बाहर नहीं, भीतर होती है।
और सबसे सच्ची भक्ति वही है, जो करुणा से जन्म ले।
जब भी जीवन में क्रोध आए, इस प्रसंग को याद कीजिए—
भगवान विष्णु ने लात खाकर भी प्रेम चुना।
यही सनातन की आत्मा है, और यही मानवता का शिखर।

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