हिंदू परंपरा में शिव का नाम आते ही भक्ति, रहस्य और गहन दर्शन का भाव जाग उठता है। मंदिरों में उनकी पूजा होती है, मूर्तियाँ स्थापित हैं, और करोड़ों लोग उन्हें भगवान मानते हैं। लेकिन जब हम हिंदू दर्शन और योग परंपरा को गहराई से समझते हैं, तो एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है— क्या शिव वास्तव में एक “ईश्वर” हैं, जैसा हम आमतौर पर समझते हैं? यदि नहीं, तो उनकी मानव आकृति में पूजा क्यों की जाती है? और सबसे बड़ा प्रश्न— शिव को अपने भीतर कैसे पाया जाए? यह लेख इन प्रश्नों का उत्तर सरल, स्पष्ट और सहज भाषा में देने का प्रयास करता है। क्या शिव पारंपरिक अर्थों में ईश्वर हैं? सामान्य रूप से शिव को हिंदू त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—में से एक माना जाता है, जहाँ शिव को संहारक कहा गया है। लेकिन यह केवल एक सतही समझ है। प्राचीन हिंदू ग्रंथों और योग दर्शन में शिव को किसी आकाश में बैठे, वरदान देने वाले देवता के रूप में नहीं देखा गया है। वहाँ शिव को कहा गया है— शुद्ध चेतना निराकार सत्य वह मौन जो हर गतिविधि के पीछे है वह ऊर्जा जिससे सृष्टि चल रही है शब्द “शिव” का अर्थ ही है— जो नहीं है , यानी जो रूप, ...